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Thursday, 9 May 2013

देस की युवा पीडी की बदलती सोच


आज से कुछ साल पहले जंहा किसी शराब की दूकान के बाहर कोई युवा खड़ा रहता था तो उस से हजारो सवाल पूछे जाते थे ! लेकिन आज शराब की दुकान में जाना और बिअर बार में जाना तो एक फेसन बन चूका हे ! आज कोई आदमी अगर एक बड़ी कम्पनी में काम करता हे तो वो अपने कमाए हुए पेसो को मस्ती में खर्च करता हे क्योकि उसकी यही सोच हे की वो सिर्फ अपने लिए ही कमा रहा हे! कुछ लोगो को मानना हे की आज की युवा पीडी बिंदास हे, लेकिन युवा पीडी किस दिशा में जा रही हे उसका किसी को चिंतन नहीं हे !
आप किस पार्टी बार में चले जाईये और उन युवा से पूछिए की क्या उनके माता पिता को पता हे की वो यंहा हे तो आपको उतर न ही मिलेगा ! जी हा युवा पीडी अपने पेरो पे कड़ी होने के बाद अपने फेसले खुद करती हे ! इसके आलावा मुंबई, पुणे जेसे सहरो में तो युवा पीडी अपने रिस्तो से भी मुखर रही हे ! वे डांस, पार्टी, मस्ती, फेसन जेसी जगह पर तो खुलकर बोलते हे, लेकिन कोई कार्यक्रम या धार्मिक समारोह पर तो बोलने में उन्हें शर्म आती हे ! आज बड़े सहरो में युवा जॉब करने के लिए आते हे और यही बस जाते हे वापिस अपने गाँव की और देखते तक नहीं हे ! माता पिता से दूर होने के कारन उन्हें ज्यादा टोकने वाला भी नहीं होता हे ! लडको के साथ आज के दोर  में लडकियों ने भी यही रह पकड़ ली हे ! जीवन की भागदोड में अगर कोई पुरुष मित्र साथ में हे तो वो इसे अपनी सुरक्षा मानती हे ! इस सब में कही भी अपराध बोध नजर नहीं आता ! टेलीविजन और फिल्मो के प्रभाव के कारन आज के युवा जीवन साथी भी बदलने में गुरेज नहीं करते हे ! किशोर युवक - युवतिया समय से पहले ही अल्कोहल के सीकर हो जाते हे ! अगर इन सबसे बचना हे तो युवाओ को अपने फेसले अपने विवेक से लेने होंगे और उन पर अमल करना पड़ेगा ! अगर युवा पीडी दिमाग का इस्तेमाल करेगी तो अपने आप को और दुसरो को भी हेंडल कर सकेगी ! शानदार  नोकरी और ज्यादा तनख्वाह के बिच माँ बाप की भी कुछ अपेक्षाए हे जिन पर आपको खरा उतरना हे !
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3 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (10-05-2013) के "मेरी विवशता" (चर्चा मंच-1240) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत सार्थक आलेख...

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